Wednesday, 25 June 2025

विशुनगढ़ किला कन्नौज

विशुनगढ़ (कन्नौज) किले का इतिहास: 

विशुनगढ़ रियासत का कभी अयोध्या तक था राजपाट, अब ग्राम पंचायत बनकर रह गई कन्नौज में ऐसी ही एक रियासत रही है विशुनगढ़। 17वीं सदी में यह रियासत अयोध्या तक फैली थी। 16 छोटी बड़ी रियासतें इसके अधीन थीं। लेकिन आज विशुनगढ़ महज ग्राम पंचायत है।इंसान, सभ्यताएं और स्थान सभी में फर्श से अर्श और अर्श से फर्श का सफर चलता ही रहता है। बड़े बड़े साम्राज्य सिमट जाते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतें मिट जाती हैं। उनके भग्नावशेष उस इतिहास को लंबे समय तक स्मृतियों में बनाए रखते हैं। कन्नौज में ऐसी ही एक रियासत रही है विशुनगढ़। 17वीं सदी में यह रियासत अयोध्या तक फैली थी। 16 छोटी बड़ी रियासतें इसके अधीन थीं। लेकिन आज विशुनगढ़ महज ग्राम पंचायत है। इसके किले व अन्य भवन खंडहर हो रहे हैं। दूर दूर से लोग इन्हें देखने आते हैं। 

यह छिबरामऊ तहसील क्षेत्र में कन्नौज और मैनपुरी जिले की सीमा पर स्थित है। यहां के किले में अब अंतिम राजा चौधरी सदानंद के इकलौते पुत्र स्व.अवधेश कुमार की विधवा रानी पुष्पा अपने परिवार सहित रहती हैं। वह बताती हैं कि अंग्रेजों ने विशुनगढ़ पर कई बार आक्रमण किए, लेकिन अधिकार नहीं जमा पाए। ३ लाख ५६ हजार की मालगुजारी अदा करने के कारण राज्य की प्रतिष्ठा चरम पर थी।विशुनगढ़ राजघराने के जमींदार हनुमान प्रसाद तिवारी के चारो पुत्र महानन्द, आसकरन,उदयचन्द्र व कामराज बड़े पराक्रमी थे।
उन दिनों लखनऊ के नवाब का २४ लाख रूपया कन्नौज के गाजर क्षेत्र में बकाया था जिसे वसूल करने का ठेका इन चारो भाइयों ने इस शर्त पर लिया कि ३ लाख रूपये नवाब को देगें और बाकी भाग उनका होगा।चारो भाइयों ने यह रकम वसूल ली जिसमें से ३ लाख रूपया सहित ४२ ऊंटगाड़ी व ६४ बैलगाड़ियां नवाब को देने के बाद 
२१ लाख रूपये चारो भाई खुद ले लाये। जिससे विशुनगढ़ , इन्दरगढ़,जसपुरापुर,सरैया व गंगागंज गुरौली में चार शानदार किले बनवाये। तत्कालीन रानी ने लखनऊ के नबाब वाजिद अली शाह से मिलकर गोमती से सरयू के बीच का अपना क्षेत्र वापस नबाब को सौंप दिया। 

इसमें अयोध्या भी शामिल था। नबाब के खजाने से चार हजार रुपये सालाना विशुनगढ़ को मिलते थे। अंग्रेजों ने जब अवध का शासन अपने हाथों में लिया, रियासतों की हालत खराब होने लगी। विशुनगढ़ भी इससे अछूता न रहा और इसका अस्तित्व खत्म होने लगा। आजादी के बाद इसे महज ग्राम पंचायत का दर्जा मिला। महल खंडहर होने लगे। किले के उत्तराधिकारियों की अंतिम श्रंखला में चौधरी सदानंद इस किले में काबिज हुए। उनके समय में ही जमींदारी खत्म हो गई और फिर यह रियासत और किला खंडहर में बदलता चला गया। राम जन्मभूमि से सदियों पुराना जुड़ाव और लगाव रहा 
अयोध्या में जब राम जन्मभूमि को लेकर विवाद शुरूहुआ, उस समय मंदिर निर्माण के लिए विशुनगढ़ स्टेट ने भी पहल की। शहर के इतिहासविद् रहे 
इंजीनियर स्व. सुप्रभाष सक्सेना ने उन दिनों के बारे में काफी कुछ लिखा। उसके मुताबिक अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की कोशिश 1853 में भी हुई थी। उस समय भी काफी विवाद हुए थे। तब निर्मोही अखाड़ा ने विवादित ढांचे पर अपना दावा किया था। महंत रघुवरदास ने विशुनगढ़ की रानी को पत्र लिखकर मदद मांगी थी। इस पर रानी ने उन्हें 800 सोने की मोहरें दी थीं। उसके बाद राम मंदिर निर्माण का मामला कोर्ट में चला गया। 

लखनऊ के इमामबाड़े की तर्ज पर बनी है बारादरी 
विशुनगढ़ किले के अंदर लखनऊ के इमामबाड़े की तर्ज पर बारादरी कचहरी व शीशमहल का निर्माण चौधरी फतेहचंद्र ने कराया था। पुन: काबिज होने की खुशी में बिहारीजी महाराज कृष्ण मंदिर की स्थापना राजा उदयचंद्र ने कराई थी। राजा फतेहचंद्र की पत्नी धनरानी ने किले के विशाल दरवाजे के सामने धनेश्वरनाथजी (शिवजी) का मंदिर बनवाया था और पास में ही तालाब भी खुदवाया था। बताते हैं कि करीब 50 साल पहले किले के पास खेत की जुताई करते समय नीचे दबी तोप की नाल मिली थी, जो पुलिस लाइन कन्नौज में सुरक्षित रखवा दी गई थी।

रानी के निसंतान होने के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने राज्य हड़प नीति के अंतर्गत विशुनगढ़ को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, लेकिन इससे पहले रानी ने वृंदावन के ठाकुर बांके बिहारी को राजा बना दिया और संतान के रूप में चौधरी सदानंद को गोद ले लिया।

विशुनगढ़ के किले के भग्नावशेष में आज भी बांके बिहारी का मंदिर और विग्रह विराजमान है। इस कारण यह राज्य कभी भी अंग्रेजों के अधीन नहीं रहा। 
आज करीब १५० वर्ष पुराने विषुनगढ़ के किले में बहुमंजली इमारत ही नहीं है बल्कि तहखाने एवं किले से बाहर जाने के लिये गुप्त सुरंगें भी है।तहखाने के नीचे तहखाना तथा प्रत्येक तहखाने को अलग - २ जाने वाले रास्तों जीनों का मिलान इस तरह बनाया गया है कि शीशमहल में बैठा कोई भी व्यक्ति तहखाने में प्रवेश करते किसी भी व्यक्ति को देख सकता है।शीशमहल के चारो कोनों पर सरक्षाकर्मियों के लिये गुप्त ठिकाने भी थे।ऐसा प्रतीत होता है जैसे किले में काफी खजाना होगा।किले के खंडहर मात्र देखने से इसकी भव्यता का अंदाज लगाया जा सकता है।

चिंतामणि धाम, कन्नौज ( सीताराम जी चरण पादुका)

चिंतामणि धाम, कन्नौज ( सीताराम जी चरण पादुका)

माता गोवर्धनी देवी मंदिर - बाबा स्थल पठकाना , कन्नौज

मूल श्री विग्रह माता गोवर्धनी देवी जी
स्थान:- बाबा स्थल पठकाना , कन्नौज

अजय पाल मंदिर कन्नौज

अजयपाल का मन्दिर : - 
वर्तमान नगर के मध्य में लगभग पूर्व की ओर बड़ी ऊँचाई पर यह मन्दिर स्थित है। पूज्यपाद श्री अजयपाल महाराजा जयचन्द के गुरु थे और उन्हीं की स्मृति में महाराज ने यह मन्दिर बनवाया था। मन्दिर के भीतर महात्मा अजय-पाल की मूर्ति स्थापित है। लाल पत्थर में बनी हुयी यह मूर्ति हाथ में शूल (त्रिशूल) पकड़े है। वर्तमान में मूर्ति के हाथ में पुस्तक है। थद्धावान जन श्रावण के माह में इस पर शरबत और बताशे चढ़ाते हैं। वर्तमान मन्दिर तीन-चार सौ साल से अधिक पुराना नहीं है किन्तु उक्त स्थान प्राचीन है।

पद्मपुराण में जयपाल (पूर्वलिखित अजयपाल नहीं) का निर्देष आता है और यह लिखा है-

जयपालो महावीरश्चक्रवर्ती धनेश्वरः । 
आसीत्पुरा कृत युगे राज्यं त्यक्त्वा महीपतिः ।।"

अर्थात् जयपाल महावीर चक्रवर्ती तथा धन सम्पन्न नृपति सत्ययुग में हुये थे और जो राज्य को त्याग कर विरक्त हो गये थे। उक्त पुराण में यह भी लिखा है उन्होंने योग कर सब सिद्धियों को प्राप्त किया था तथा वह सब सिद्धियों सहित चारों युगों में वहाँ निवास करते हैं। वहाँ स्नान कर पक्वान द्वारा महात्मा जयपाल की पूजा करने से सिद्धि प्राप्त होती है।

उपरलिखित विभिन्न विवरणों से ऐसा समझ पड़ता है कि चक्रवर्ती महाराज जयपाल जयचन्द के गुरु अजयपाल से भिन्न थे। यह भी सम्भव है कि आदि जयपाल स्वामी के उत्तराधिकारी इस स्थान (पीठ) के मठाधीश होते रहे हों और जयपाल (अथवा अजयपाल) के नाम से विख्यात रहे हों। इस प्रकार जो मठा-घीश महाराज जयचन्द के समय में विराजमान रहे हों उन्हें महाराज ने अपना गुरु माना हो। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित परिपाटी भी इसी प्रकार की है जिसके अनुसार भारत की चारों पीठों के पीठाधीश शंकराचार्य के नाम से जाने जाते हैं। उक्त बात का समर्थन इससे होता है कि पद्म पुराण के अनुसार महात्मा जयपाल सदैव वहाँ निवास करते हैं। यथा-

चतुर्य्यगेषु वसितः सर्वं सिर्द्धनिषेवितः ॥३

अर्थात् सब सिद्धियों के सहित वे चारों युगों में वहाँ निवास करते हैं।

वर्तमान मंदिर में पुजारी परिवार रहता और सेवा करता है।