Tuesday, 28 October 2025
कन्नौज ने 6वीं शताब्दि में खेली थी शतरंज की पहली चाल
कन्नौज ने 6वीं शताब्दि में खेली थी शतरंज की पहली चाल":वर्ल्ड चैस फाउंडेशन का दावा"
20 मार्च 2014 को हमने एक पोस्ट डाली थी।इसमें हमने शतरंज का प्रारम्भ कन्नौज शहर माना था जबकि इतिहासकार ऐसा नहीं मानते थे।कन्नौज प्राचीन भारतवर्ष की राजधानी थी।यहाँ 6वीं शताब्दि में राजा हर्षवर्धन का राज्य था।खेत जुताई या मकानों की नींव खोदते समय टैराकोटा के टुकड़े मिलते रहे है।4वीं व 6वीं शताब्दी में प्राप्त टेराकोटा के ये टुकड़े भारत में शतरंज का इतिहास खोलते है।इन्हें शतरंग के प्यादे माना गया।शतरंज चतुरंग का रूपांतर है जो भारत में 4वीं या 6 वीं शताब्दी या उससे पहले उत्पन्न हुआ था।चतुरंग एक 8 × 8 बोर्ड पर खेला जाता था जिसे 'अष्टपद' कहा जाता था। यह खेल प्राचीन भारतीय सेना के चार गुना विभाजन को दर्शाता है जिसमें इन्फैंट्री, हाथी, घुड़सवार सेना और रथ शामिल हैं।परंतु कुछ आर्केलाजिस्ट ऐसा मानने में दुविधा व्यक्त करते थे?कारण था इन टुकड़ों का एक जगह नहीं पाया जाना।
आज अमर उजाला समाचार पत्र में हैडलाईन कन्नौज को हैरिटेज सिटी घोषित करने का समाचार पढ़कर अत्यंत खुशी हुई।इसके अनुसार शतरंज खेल कन्नौज से प्ररम्भ हुआ माना गया है।शतरंज को लेकर चैरिटी ट्रस्ट चैस हिस्ट्रोरिकल रिसर्च संस्था जर्मनी के संस्थापक करीब 20 साल से 50 देशों में प्रतिनिधियों की मदद से शोध कर रहे थे।उन्हें जानकारी हुई कि सातवीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन ने चतुरंगा खेल की शुरुआत की थी। कन्नौज संग्रहालय में पक्की मिट्टी के गजारोही,अश्वरोही,पैदल योद्धा देखकर शतरंज के प्यादे होने के साक्ष्य मिले। इतिहासकारों का मानना है कि हर्षवर्धन युद्ध के दौरान 24 भागों में सेना को बांटकर युद्ध लड़ते थे। सेना के भागों के जमीन में चित्र बनाकर प्यादों को रखकर चतुरंगा खेलते थे।मौजूदा समय में इसी खेल को शतरंज (चेस) नाम से जाना जाता है।
इस चैस फाउंडेशन ने कन्नौज में पुरातत्व विभाग की मदद से दो दिवसीय 27 और 28 फरवरी को शतरंज सेमिनार का आयोजन रखा है।इसमें अमेरिका, कनाडा, स्वीडन, ब्राजील, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जकार्ता, रूस, मलेशिया, सिंगापुर और जापान से प्रतिनिधि भाग लेंगे। शतरंज सेमिनार का मुख्य उद्देश्य कन्नौज की धरती से यहां शतरंज के ईजाद होने का संदेश देना है।
विनयपिटक,एक बौद्ध ग्रन्थ जो भिक्षुओं और ननों के लिए मठ के नियमों का वर्णन करता है।उसमें उल्लेख है कि एक धर्मांतरित व्यक्ति को अष्टपद से दूर रहना चाहिए,जबकि जैन पाठ सुयागदम् एक कदम आगे बढ़ता है और कहता है कि लोगों को खेल खेलना भी नहीं सीखना चाहिए।
महाभारत और वासवदत्ता में खेल की तरह शतरंज (चौसर)के संदर्भ हैं।
लेकिन बाणभट्ट की हर्ष चरित्र पुस्तक में चतुरंग का प्रारंभिक संदर्भ है।
अब जर्मन इंडोलॉजिस्टों के एक समूह ने दावा किया है कि शतरंज की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के कन्नौज में हुई थी जब यह मौखरी साम्राज्य की राजधानी थी।मौखरी शासक शारवा वर्मन ने अपने समकालीन फ़ारसी शासक ख़ुसरु-द्वितीय को नमकपेट्रे (बारूद की एक किस्म) के बदले 'चतुरंग' का खेल उपहार में दिया था।
हाल ही में एक किताब 'कन्नौज, द मौखरी और चतुरंगा - शतरंज की उत्पत्ति और भारत से फारस के लिए अपने रास्ते,रानेट द्वारा लिखित,ने आगे के शोध की नींव रखी। एडर ने कहा कि मौखरी शासक सैन्य अभियानों में जाने से पहले 16 कैबिनेट टेराकोटा के साथ 'चतुरंग' खेलते थे। यहां तक कि बाणभट्ट ने अपने 'हर्षचरित' में शतरंज के समान 'अष्टापद' नामक खेल का उल्लेख किया था।
ऐतिहासिक लेखों में कहा गया है कि गुप्त काल के दौरान एक भारतीय सेना का स्कूल था जहाँ कैडेटों को 'अष्टापद ’पर टेराकोटा के टुकड़ों के माध्यम से युद्ध के बारे में सिखाया जाता था,जो फिर से अपने आदिम चरण में शतरंज का खेल था।
पहले कन्नौज फर्रुखाबाद का ही हिस्सा था।कम्पिल व सौरिख में आज भी टैराकोटा के हाथी घोड़े आदि मिलते है।फर्रुखाबाद भी महाभारत कालीन शहर है।इस लिये कन्नौज के साथ ही फर्रुखाबाद को भी हैरिटेज शहर घोषित किया जाना चाहिये।
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